उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक रिव्यू : ये फिल्म कई देशद्रोही लोगों को सोने नहीं देगी !


डायरेक्टर: आदित्य धर
स्टार कास्ट: विक्की कौशल, यामी गौतम, परेश रावल, मोहित रैना, कीर्ति कुल्हाड़ी, राजित कपूर, मनोहर पर्रीकर, स्वरुप सम्पत
रेटिंग – ⭐️⭐️⭐️⭐️⭐️

फिल्म सच्ची घटना पर आधारित हैं, ये फिल्म उन लोगो के मुँह पर भी तमाचा हैं जिन्हे भारतीय सेना से सबूत मांगने की आदत हैं. उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ फिल्म नहीं हैं बल्कि आपके शरीर का हिस्सा हैं.

कहानी : फिल्म की कहानी भारत -म्यांमार सीमा पर पूर्वोत्तर के आतंकियों द्वारा जंगल से गुजर रहे सेना के एक काफिले पर हमला करने से होती हैं. सिपाही जोशभरे गीत गाते हुए नज़र आ रहे थे की अचानक से गोलियों की आवाज़ से पूरा जंगल चीत्कार उठता हैं. सिनेमाघर में गोली की आवाज़ आपके कानो को सुन्न कर देगी और इस सीन के बाद से ही आपके भीतर एक गुस्सा जाग उठेगा. इस हमले का बदला लेने के लिए भारत -म्यांमार बॉर्डर पर विहान सिंह शेरगिल के नेतृत्व में एक सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया जाता है जिसमे सभी आतंकवादियों को कुत्ते की मौत मारी जाती हैं.

उसके बाद कहानी शुरू होती हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ( राजित कपूर ), अजित वोवाल ( परेश रावल ) और उस समय के रक्षामंत्री ( मनोहर पर्रीकर ) से जहाँ भारत -म्यांमार बॉर्डर पर विहान सिंह शेरगिल के नेतृत्व में हुयी सर्जिकल स्ट्राइक के जीत के जश्न पर. विहान सिंह शेरगिल ( विक्की कौशल ) और करण कश्यप (मोहित रैना) अपने परिवार के साथ खुशी के पल बिताते हुए नज़र आते हैं. बीच -बीच में पंजाब और कश्मीर की छोटी-छोटी आतंकवादी घटनाये भी सामने आते रहती हैं जिन्हे सरकार और इंटेलिजेंस एजेंसियां अपनी निगरानी में सुलझाते हुए नज़र आती हैं. फिर आता हैं वो सीन जिसके बाद पूरा देश पाकिस्तानी द्वारा भेजे गए आतंकवादियों के हमले की वजह सुलग उठता हैं. यह सीन था उरी का जहाँ केम्प में सोते हुए भारतीय सिपाहियों पर कायराना तरीके से हमले कर दिए जाते हैं. उरी हमले में १८ सिपाही शहीद हो जाते हैं जिसमे करण कश्यप (मोहित रैना) भी शहीद हो जाते हैं.

इस हमले के बाद पूरे देश में गुस्से का माहौल पैदा हो जाता हैं. प्रधानमंत्री मोदी जी एक मीटिंग करते हैं जिसमे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार गोविन्द (परेश रावल) सर्जिकल स्ट्राइक करने का सुझाव देते हैं. इसके बाद जब फिल्म आगे बढ़ती हैं उसे यहाँ शब्दों में समझा सकना सही नहीं होगा. लेकिन इतना ज़रूर हैं की फिल्म देखने के बाद आप तालियां भी बजायेंगे, आपकी आँखें नम भी होगी और अपने भारतीय होने के साथ भारतीय सेना पर भी गर्व होगा.

इस विषय पर फिल्म बनाना हर किसी के बस की बात नहीं लेकिन आदित्य धार ने इस फिल्म में वो कर दिखाया. कुछ लोग इसे राजनीती के चश्मे से देखेंगे, उन्हें देखने दो उनका काम ही यही हैं. उन्हें बस अपनी कुर्सी और सत्ता का लालच हैं. देशभक्ति हर किसी के बस की बात नहीं, देश में कुछ गद्दारों का होना भी ज़रूरी हैं. बहुत सारे बिकाऊ मीडिया ने इस फिल्म को १ या २ स्टार की रेटिंग दी हैं…उनका हक़ हैं ! क्यूंकि उनके गले में पैसे वाली लालच और देशद्रोह की हड्डी अटकी हुयी हैं जो रहते तो भारत में हैं लेकिन गाते पाकिस्तान की हैं.

फिल्म के गीत और संगीत को इस तरह से फिल्माया और दर्शाया गया हैं जो फिल्म की गंभीरता को तनिक भी भटकने नहीं देती हैं. सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग, इम्प्लीमेंटेशन सभी को इस तरह से दिखाया गया हैं जैसे ये साडी ही चीज़े आपके सामने हो रही हैं. आप सिनेमाघर की कुर्सी पर पॉपकॉर्न खाते हुए आराम से नहीं बैठे रहते. आप उसी तरह से अलर्ट होकर इस फिल्म को देखते रहते हो जैसे आपको सरहद की निगरानी का जिम्मा सौंप दिया गया हो. आप जिस तरह से किसी हॉलीवुड फिल्म को देखते हैं यह फिल्म आपको उसी तरह से लगती हैं. उरी में शहीद हुए गोरखा रेजिमेंट के कर्नल एम एन रॉय के पार्थिव शरीर के पास उनकी बेटी को वार क्राई करते हमने न्यूज चैनलों पर देखा था. ठीक उसी सीन को इस फिल्म में भी दर्शाया गया हैं जहाँ करण कश्यप (मोहित रैना) के शहीद हो जाने के बाद उनकी बेटी वार क्राई करते हुए नज़र आती हैं. जिसे देखने के बाद आंसू कब आपकी आँखों से छलक जायेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा.

अभिनय : विक्की कौशल इस फिल्म की जान हैं. इस फिल्म में वो बॉलीवुड कलाकार कम एक आर्मी पर्सन ज़ायदा लगते हैं. उनके बोलने, चलने, लड़ने की अदा देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो रियल में आर्मी वाले ही हैं. मोहित रैना भी फिल्म में छाये रहे जबकि उनका रोल फर्स्ट हाफ तक ही हैं. यामी गौतम, कीर्ति कुल्हाड़ी अपनी-अपनी जगह ठीक हैं. परेश रावल के अभिनय के बारे में तो आंकना ही गलत होगा, वो एक मंझे हुए कलाकार हैं जो इस फिल्म में साफ़ दिखाई पड़ती हैं. रजीत कपूर ने भी मोदी जी के किरदार को भलीभांति तरीके से निभाया हैं है वो अलग बात हैं की आप यह सोच रहे हैं की राजित कपूर इस फिल्म में मोदी जी का किरदार निभा रहे हैं तो उन्ही की तरह बोल रहे होंगे, ऐसा नहीं हैं.

कमज़ोर कड़ी : हर फिल्म की तरह इस फिल्म में कुछ कमजरो कड़ी हैं जैसे परेश रावल का हर बातचीत के बाद मोबाइल फोन को तोड़ देना और उनके साथ वाले व्यक्ति का एक नए डिब्बे से नए फोन का निकलना. शायद फिल्म में एक हलके फुल्के हास्य के लिए भी ज़रूरी था. इस मिशन में गरुड़ ड्रोन वाकई लाजवाब हैं किन्तु एक दिन में एक इंटर्न के भरोसे सब कुछ दिखाना थोड़ा अटपटा था किन्तु फिल्म में रोमांचक था. लेकिन इसे आप कमज़ोर कड़ी मत समझीये ये फिल्म की जान हैं.

अंततः आप सभी से निवेदन हैं की इस फिल्म को ज़रूर देखे और सिनेमाघर में ही देखें. क्यूंकि ऐसी फिल्म आपको मोबाइल की स्क्रीन पर देखने में अच्छे नहीं लगनेवाली. पैसे नहीं हैं तो उधार मांग लीजिये…मेरे पास भी नहीं थे ! मुझे भी उधार लेना पड़ा ! जो लोग ये कह रहे हैं की फिल्म को इलेक्शन के पहले रिलीज़ करना मोदी जी की चाल हैं तो वो सही कह रहे हैं उन्हें कहने दीजिये. क्यूंकि मैंने शुरुवात में ही कह दिया हैं की देशभक्ति हर किसी के बस की बात नहीं..देश को आज मोदी जी जैसा ही प्रधानमंत्री चाहिए…जो सिर्फ और सिर्फ देश के बारे में ही सोचते हैं. जिनके पास कोई मुद्दा नहीं हैं मोदी जी को हराने के लिए वो ऐसे ही हथकंडे अपनाते हैं.

– मुकेश दुबे

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