सुशांत केस सिर्फ चुनावी और राजनैतिक मामला बनकर रह गया. सीबीआई फेल हो चुकी संस्था एक साल जांच के नाम पर टाइमपास


सुशांत हम शर्मिंदा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं. ये स्लोग्न इस वक्त सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं. इसकी बड़ी वजह हैं. एक साल हो गए लेकिन अभी तक सुशांत केस में कुछ भी साफ़ नहीं हुआ. ये सबसे बड़े विफलता हैं इस देश की सरकारों की, पुलिस की, सीबीआई की, एनसीबी की.

सुशांत को लेकर कई बात हो चुकी हैं. लगभग हर बात हर किसी को मुंहज़ुबानी याद हो चुकी हैं. सुशांत केस सिर्फ चुनावी मुद्दा और राजनीतिक रंजिश की उठापटक में दबकर रह गया. क्या हमारे देश की सीबीआई एक नाकाम संस्था हैं. क्या वो इतनी समर्थ नहीं हैं की वो एक साधारण सा केस सुलझा सकें.

साधारण इसलिए बोल रहा हूँ की क्यूंकि सुशांत एक असाधारण इंसान थे. और उनका असाधारण इंसान होना ही इस केस को अब तक सुलझा नहीं पाया हैं. क्यूंकि साधारण मर जाये उसे कोई पूछता तक नहीं हैं. ऐसी मौतें हर रोज़ होती हैं. लेकिन जब असाधारण इंसान मरता हैं वो भी संदेह वाली सिचुएशन में तो मामला राजनीतिक फायदा से जुड़ जाता हैं.

राजनीतिक पार्टियों ने देखा की सुशांत केस को लेकर जनता बहुत ज़्यदा भावुक हैं तो क्यों ना इसका राजनीतीकरण किया जाएं. जो मर गया सो मर गया वो लौटकर आनेवाला नहीं. लेकिन उसकी लाश पर राजनीतिक फायदा तो ले ही सकते हैं.

बिहार चुनाव में सुशांत की मौत का फायदा हर राजनीतिक पार्टी ने उठाया. किसी ने सड़क बनवा दी. किसी ने उस सड़क पर सुशांत का नाम रख दिया. किसी ने उसी सड़क पर सुशांत का बोर्ड और पानी पीने का नल लगा दिया. को फिल्म बना रहा, कोई पैसे जमा कर रहा तो कोई किताबें लिख रहा. बदनाम बॉलीवुड मौत के बाद सुशांत को अवार्ड दे रहा हैं. मीडिया वाले मोस्ट पॉपुलर सेलिब्रिटी में पहला नंबर दे रहे.

मतलब जिसे जहा फायदा मिल रहा वो सुशांत के नाम पर ले रहा. कुछ गिने चुने यू टूबेरस हैं जो सुशांत की आवाज़ बन रहे हैं तो उनकी आवाज़ को भी दबा दिया जा रहा. बहुत से लोग कमेंट करते हैं की तुम सुशांत पर वीडियो नहीं बनाते. अरे भाई हर रोज़ सुशांत पर बिना वजह वीडियो बनाकर क्या मतलब हैं. जब तक इस केस से जुड़ा कोई सही सबूत या न्यूज़ सामने नहीं आता तब तक सुशांत पर कुछ भी फेक न्यूज़ बनाकर तो दिखा नहीं सकते हैं.

आप इस बात को मन लीजिये सुशांत का केस उतना ही साफ़ है जितना साफ़ पानी होता हैं. जितना साफ़ एक आईना होता हैं. इस केस को बस जानभूझकर खींचा जा रहा हैं. क्यूंकि भारत एक ऐसा देश हैं जहा पर सबूत बचाकर रखे जाते हैं ताकि चुनाव के वक्त विरोधी पार्टी पर इस्तेमाल किया जा सकें.

अभी महाराष्ट्र में अगले साल बीएमसी इलेक्शन होने हैं. उत्तरप्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना हैं. तो सुशांत का केस बचाकर रखा जाएगा. ऊपर से महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के एक साथ आने की बाते भी चल रही हैं.

एक चीज़ मैंने नोटिस की हैं. अगर मामला किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा होता हैं. भले ही उसमे लाख सबूत हो लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी दूसरे नेता को जेल नहीं भिजवाती. अगर हर नेता पर ईमानदारी से केस चले तो पक्ष और विपक्ष मिलकर सब जेल में चले जाएं. राजनीती खून मांगती हैं. कोई नेता साफ़ सुथरा नहीं होता. और जनता इन्साफ मांग मांगकर थक जाती हैं. मर जाती हैं.

बस देखना यही हैं की सुशांत केस को कितना खींचा जाता हैं. क्यूंकि सुशांत केस को ईमानदारी से हफ्ते भर में सुलझाया जा सकता हैं. लेकिन ऐसा होगा नहीं.

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