RAAKSHAS MOVIE REVIEW : जंगल की शांति से निकल कर आया राक्षस, सोचने को किया मज़बूर !


रेटिंग : ४ / 5  

इस साल की बेहतरीन फिल्म, देखना ना भूले !

एक समय था जब लोग सिर्फ बॉलीवुड की फिल्म देखना ही पसंद करते थे, लेकिन दुसरे भाषा में बनी फिल्में सिर्फ उस भाषा से जुड़े लोग देखते थे या तो फिर इस तरह की फिल्में बहुत ही कम सिनेमाघरों में लगती थीं. अगर बात मराठी सिनेमा की हो तो पिछले कई साल से फिल्में बनाने का पूरा तरीका ही बदल गया हैं. हर बार कुछ ना कुछ नया होता हैं. अब मराठी फिल्मों में हर बार आपको कुछ नया और बेहतर देखने का मौका मिलता हैं.

फैंड्री’, ‘हाफ टिकट’, ‘शाला’, जैसी मूवी बनाने के बाद विवेक कजारिया और नीलेश नवलखा ने इस बार शरद केलकर, साई तम्हनकर और बाल कलाकार रुजुता देशपांडे को लेकर एक फिल्म बनाई ‘राक्षस’ जिसे देखकर मराठी सिनेमा पर आपका विश्वास और भी ज़्यादा बढ़ जायेगा. जंगल की कहानी को इस तरह से पिरोया गया हैं की फिल्म के अंत तक आप उसकी स्टोरी के सस्पेंस को समझ नहीं पाते हो.

कहानी : अविनाश प्रकाश ( शरद केलकर ), इरावती प्रकाश ( साई तम्हनकर ) और अरु ( रुजुता देशपांडे ) मुंबई में अपनी ज़िंदगी बेहतर तरीके से जी रहे हैं. अविनाश जो जंगल में रहनेवाले आदिवासियों को लेकर एक डाक्यूमेंट्री बना रहा हैं और इसी बीच इस फिल्म में पैराडाइस नाम की एक कंपनी जंगल काटकर वहां बिल्डिंग बनाना चाहती हैं जिसका विरोध वहा के आदिवासी करते हैं. इसी दौरान अविनाश गायब हो जाता हैं जिसे ढूढ़ने के लिए इरावती और अरु उस जंगल में जाते हैं. जिसके बाद फिल्म की कहानी को जिस अंदाज़ा में आगे बढ़ाया गया हैं वो वाकई कबीले तारीफ़ हैं.

अभिनय : ‘लय भारी’ में विलेन और बाहुबली में प्रभास को अपनी आवाज़ देनेवाले अभिनेता शरद केलकर जितने भी समय के लिए हैं वो ठीक ठाक हैं, साई तम्हनकर अपने जिस अंदाज़ के लिए जानी जाती हैं वो इस फिल्म में दिखाई पड़ रहीं हैं वो हर तरह के किरदार करने में सक्षम हैं. लेकिन इस फिल्म की जान हैं रुजुता देशपांडे जो फिल्म में इतनी खामोशी से अभिनय करने के बाद भी ऐसा लग रहीं हैं जैसे वो इस फिल्म की मुख्य किरदार हैं.

संगीत : एंड्रू मैके ने संगीत में कोई कसार नहीं छोड़ी हैं हर सीन के हिसाब से फिल्म का संगीत बेजोड़ हैं.

एडिटिंग : फिल्म में थोड़ी से एडिटिंग और की जाती तो १०-१५ मिनट के सीन काम किये जा सकते थे लेकिन एडिटिंग भी सी फिल्म की जान हैं.

निर्देशन : फिल्म का निर्देशन किया हैं दँयाणेश जहॉटिंग जिन्होंने अपनी पूरी कल्पना इस फिल्म में डाल दी हैं. कहानी को कब किस तरह और किस परिष्तीथी में पिरोना हैं शायद इनसे अच्छा कोई ना कर पाएं या बहुत कम लोग हैं.

क्यों देखें : जिस तरह से जंगल काटकर शहर बसाये जा रहे हैं और आदिवासियों से लेकर जंगल के जानवर सभयता से गायब होते जा रहे हैं वो दिन दूर नहीं जब सिर्फ शहर ही दिखाई देंगे. जंगल देखना सिर्फ किताबों की बात रह जायेगे.

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