तांडव के नाम पर बॉलीवुड की क्रिएटिविटी खत्म कर रही मोदी सरकार


जलती हुयी आगे के सामने हर कोई अपने हाथ सेंकने चले आता हैं.लेकिन कुछ मौकापरस्त ऐसे भी हैं जो आग बुझने के बाद भी उसकी राख से गर्माहट लेने की कोशिश करते हैं. बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके लिए तांडव वेब सीरीज में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे किसी की आस्था को चोंट पहुंचे. वो आग अलग बात हैं की जब पिछवाड़े में बांस किया गया तब इनकी अक्कल ठिकाने आ गयी.

अगर तांडव में कुछ गलत नहीं था तो अली अब्बास ज़फर अपना घर और ऑफिस छोड़कर फरार क्यों हो गया ? अगर गलत नहीं था तो उस सीन को डिलीट क्यों किया ? खैर हिन्दू धर्म हैं लोगो को माफ़ कर देता हैं और हिन्दू धर्म की इसी मानसिकता का बॉलीवुड और दो कौड़ी के स्टैंड उप कॉमेडियन फायदा उठाते हैं.

तो कुछ पत्रकार हैं जो पत्रकारिता कम और चाटुकारिता करने में ज़्यदा इंट्रेस्ट लेते हैं. तांडव को लेकर किसने क्या कहा पहले वो सुन लीजिये फिर आगे की बात करते हैं.

पत्रकार आशुतोष. इसका सिर्फ यही नाम हैं. अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम जोड़ना इसे सही नहीं लगता हैं. वैसे किसी के रंग का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए लेकिन ये इंसान जितना जैसा दिखता हैं उससे कहीं ज़्यदा इसका दिल काला हैं. पत्रकारिता छोड़कर राजनीती में गया और वहा से उसी की पार्टी ने लात मारकर भगा दिया. उसके बाद भी खुद को प्रूफ करने की कोशिश कर रहा हैं की मैं कितना बड़ा देशविरोधी हूँ.

तो इसने कहा,”जिस गति से लोगो को भावनाएं आहत हो रही हैं, उसके देखते हुए बहुत ही जल्दी देश में रचनात्मक काम होने बंद हो जायेंगे. फिल्मे और लेखन सरकारों को खुश करने के लिए बनेंगी.

और मेरा ऐसा मानना हैं की ऐसी रचनात्मकता को उठाकर गटर में फेंक दिया जाना चाहिए जो किसी भी धर्म या जाति का मज़ाक उड़ाती हैं. और खासकर इस तरह के इंसान को भी जो गलत को सही साबित करने की कोशिश करते हैं.

फिर आता हैं राजदीप सरदेसाई इसका ये कहना हैं की जिस तरह से ताश के सभी पत्तों को एक साथ गिरते हुए देखने में मज़ा आता हैं ठीक उसी तरह का मज़ा तांडव को देख आ रहा. लेकिन एक वेब सीरीज पर बैन लगाने की बात क्यों हो रही हैं. अगर नहीं पसंद हैं तो ना देखें लेकिन भावनाएं आहत हो गयी इस चीज़ को लेकर बैन वाली राजनीती बड़ी विचित्र हैं.

ये भी पत्रकार कम और दलाल गिरी ज़्यदा ही करता हैं. ये पत्रकार कम और सड़कछाप गुंडा ज़्यदा हैं. अमेरिका जैसे देश में जाकर भी आम जनता से मारपीट करता हैं. वो अलग बात हैं की जनता इसे पकड़कर मसाले की तरह कूट देती हैं.

अब रोहित सरदाना ने लिखा,”भावनाएं तो आप जानते ही हैं सबसे कोमल चीज़ होती हैं. कभी भी आहत हो जातीं हैं. किसी की एक कैफे के नाम से आहत होती हैं तो बुद्धिजीवी लोग सिर्फ च च कर के निकल लेते हैं और किसी की आस्था पर चोंट पड़ने में भी अभिव्यक्ति और रचनात्मकता का झंडा आ जाता हैं.

दरअसल रोहित सरदाना ने जिस कैफ़े की बात की हैं वो हैं कानपूर का अली कैफ़े जहा दो दिन पहले गिलास और खाने की पैकेट पर अली का नाम लिखा होने से मुस्लिम समुदाय की भावनाये आहत हो गयी थीं. उसी बार पर रोहित सरदाना का कहना हैं की कही कैफ़े के नाम पर लोग आहत हो जाते हैं तो सब ठीक हैं लेकिन अगर हिन्दू धर्म की भावनाये आहत हो जाये तो वो अभिव्यक्ति की आज़ादी और रचनात्मकता हैं.

वही पत्रकार सुशांत सिन्हा ने कहा,”तांडव मामले में माँगी गयी माफ़ी दिखाती हैं की अपनी आवाज़ सुनाने के लिए ना तो बम फोड़ने की ज़रूरत होती हैं और ना थाना जलाने की, बस एक जुट रहिएगा तो सबको सब सुनाई देने लगता हैं. अपनी पहचान बनाए रखियें और एकजुट रहियें, सब जगह पर आ जायेंगे.

तो दोस्तों यही हैं देश के कुछ फर्जी पत्राकर जो देशविरोधी और हिन्दू होकर हिन्दू विरोधी हैं क्यूंकि उन्हें इस बात के लिए पैसे मिलते हैं. जो पैसे मिलने पर अपना ईमान क्या अपने माँ बाप बीवी और बच्चों तक को बेच दें. लेकिन रोहित सरदाना और सुशांत सिन्हा जैसे पत्रकार हमेशा देश हित की बात करते हैं इसलिए कई लोग इनसे जलते भी हैं. ठीक वैसे ही जैसे इस कमेंट में आकर कुछ लोग मुझसे जलते हैं.

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