NAKKASH Movie Review : प्यार का पैग़ाम हैं ‘नक्काश’


धर्म और जाति पर कई फिल्में बनती हैं। कुछ प्यार बांटने का काम करती हैं और तो कुछ नफरत ! जैगम इमाम अपनी पिछली दोनों फिल्मों ‘दोजख’ और ‘अलिफ’ से इस बार कुछ अलग करने की चाहत रखते हैं और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली हैं। ‘नक्काश’ को हर वर्ग के लोगो के द्वारा पसंद किया जा रहा हैं। सरल और साफ़ शब्दों में कहें तो प्यार का पैग़ाम हैं ‘नक्काश’।

कहानी : अल्ला रखा सिद्दिकी (इनामुलहक) इस फिल्म के मुख्य किरदार हैं पेशे से नक्काश हैं जिनके पूर्वज सदियों से मंदिरों की अनूठी नक्काशी करते चले आ रहे है। अल्ला रखा सिद्दिकी भी इसी कार्य को आगे बढ़ाते हैं। इस फिल्म के एक और किरदार पुजारी वेदांत जी (कुमुद मिश्रा) जो बनारस के एक बड़े मंदिर के वेदांती हैं वो अल्ला रखा सिद्दिकी को मंदिर गर्भ गृह की नक्काशी का काम सौंपते हैं और अल्ला रखा सिद्दिकी माथे पर टिका लगाकर हिन्दू वेश में मंदिर में प्रवेश भी करता हैं।

अल्ला रखा सिद्दिकी की बीवी अब इस दुनिया में नहीं रही वो अपने बेटे मोहम्मद (हरमिंदर सिंह) के साथ रहते हैं। समद (शारिब हाशमी) जो रिक्शा चलता हैं वो अल्ला रखा सिद्दिकी का जिगरी दोस्त हैं।समद की एक इच्छा यह है की वो अपने पिता को हज पर भेजना चाहता हैं जो उनकी आखिरी इच्छा हैं। बनारस जैसे पवित्र शहर में अल्ला रखा सिद्दिकी और वेदांती जी जैसे लोग हैं जो अल्लाह और ईश्वर को एक सामान मानते हैं और प्रेम का सन्देश ही जिनका मुख्य लक्ष्य हैं। किन्तु इसी शहर में मुन्ना भैया (पवन तिवारी) और पुलिस इंस्पेक्टर राजेश शर्मा जैसे लोग हैं, जिन्हें भगवान के मंदिर में अल्ला रखा जैसे मुसलमानो का प्रवेश एक आँख नहीं भांता।

अल्ला रखा सिद्दिकी के इस प्रेम के चलते उसके मोहल्ले के लोग उसे काफिर मानते हैं और उसके बेटे को मदरसे में प्रवेश नहीं देते। समद अपने पिता को हज करने के चक्कर में अल्ला रखा सिद्दिकी के ना रहने पर उसके घर में रखें भगवन के आभूषण को चुरा लेता हैं। जिसका सारा इल्जाम अल्ला रखा सिद्दिकी अपने ऊपर ले लेता हैं किन्तु वेदांती जी को इसमें संदेह होता हैं और एक दबाव के बाद अल्ला रखा सिद्दिकी सब सच बता देता हैं। इन सभी प्रक्रिया में मुन्ना भैया अपनी राजनीती की रोटी सेंकने में सफल होता हैं।

निर्देशन : पत्रकारिता से फ़िल्मी दुनिया में कदम रखवाले जैगम इमाम अपनी पिछली दोनों फिल्मों ‘दोजख’ और ‘अलिफ’ के लिए मशहूर हैं और ठीक ऐसा ही कार्य उन्होंने नक्काश में भी किया हैं। हर फिल्म के साथ उनका निर्देशन बेहतर होता जा रहा हैं। आनेवाले समय में वो बड़े निर्देशक की भूमिका अदा कर सकते हैं।

अभिनय : इनामुलहक जिस फिल्म में अभिनय करते हैं अपने किरदार को वो जीवंत कर देते हैं। नक्काश में उनका किरदार बेहद संजीदा हैं और आपको फिल्म के अंत तक बांधे रखता हैं। शारिब हाश्मी एक बेहतर कलाकार हैं जिसका सबूत आप इस फिल्म में देख सकते हैं। कुमुद मिश्रा, पवन तिवारी और राजेश शर्मा ने बेहतरीन अभिनय किया हैं।

संगीत : फिल्म का वो गीत ‘मस्जिद की अजनो में’ बहुत ही दिल से लिखा और गाया हुआ हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी लाजवाब हैं। कंपोजर अमन पंत ने ‘ताजदारे हरम’ गाने को फिल्म में मौके पर इस्तेमाल किया है। कैलाश सिंह का बैकग्राउंड संगीत विषय के अनुरूप है।

क्यों देखें : धर्म और जाति को भूलकर प्रेम को समझना हैं तो इस फिल्म को ज़रूर देखें।

क्यों नहीं देखें : यह आपका निजी विचार हो सकता हैं। लेकिन इस फिल्म को बड़े परदे पर देखने का एक अलग ही मज़ा हैं।

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