CORONA में ऑनलाइन EDUCATION ज़रूरी है क्या ?


कहते है की जान है तो जहान हैं. कोरोना वायरस से अब तक पूरे भारत में 87,000 से भी अधिक लोगो को मौत हो चुकी हैं. कोरोना का जब शुरुवाती दौर था उस समय सख्ती बरती गयी… जो घर से बाहर निकला उसे जमकर कूटा गया. लेकिन कोरोना नहीं रुका. इसमें ना सरकार की गलती हैं और ना ही आम जनता की. सरकार ने अपना काम किया. और हमने अपना काम किया. बीमारी नयी थीं. इसका इलाज भी नहीं हैं. लोग कैसे ठीक हो रहे हैं. पता नहीं. इम्युनिटी को लेकर बात हुयी की जिसकी अच्छी होगी वो कोरोना से बच जायेगा. लेकिन मैंने ऐसे लोगो को भी देखा जो हर रोज़ जिम जाते थे. हट्टे कट्टे थे लेकिन कोरोना से बच नहीं सकें और उनकी मौत हो गयी.

ये पहली बार था जब पूरी दुनिया थम गयी थीं. हमारे देश में बिना परीक्षा दिए बच्चे पास हो गए. सरकार ने कहा की जब तक कोरोना का खौफ बना रहेगा तब तक स्कूल और कॉलेज नहीं खुलेंगे. अब इस बात से बच्चे तो खुश हो गए लेकिन स्कूल वाले परेशान हो गए की स्कूल नहीं खुलेगा तो बच्चे नहीं आएंगे. एडमिशन नहीं होगा. पढ़ाई नहीं होगी और ना ही आमदनी होगी. इस बात से सरकारी स्कूल वालो को कोई फर्क नहीं पड़ता हैं. लेकिन प्राइवेट स्कूल वालो को बहुत फर्क पड़ता हैं. क्यूंकि आज की शिक्षा ..सिर्फ बिजनेस बनकर रह गयी हैं. कोरोना में जैसे कई लोगो का काम धंदा बंद हैं ठीक उसी तरह से एजुकेशन बिजनेस भी बंद हैं.

एक दिन अगर आप स्कूल में फीस लेट जमा करते हैं तो स्कूल वाले इस तरह से दिखाएंगे की अगर आपने फीस नहीं भरी तो वो अपने टीचर्स को सैलरी नहीं दे पाएंगे. स्कूल का बिजली बिल नहीं भर सकेंगे. कहने का मतलब ये हैं की स्कूल वाले बर्बाद हो जायेंगे. जब तक फीस नहीं भरी जाती. आपके बच्चे को बाकी बच्चों के सामने जलील किया जाता हैं. उन्हें क्लास के बाहर खड़ा रहने के लिए मजबूर किया जाता हैं. इसी बीच एक्साम्स आ जाये तो धमकिया दी जाती हैं की फीस नहीं भरी तो एग्जाम में बैठने नहीं दिया जायेगा. फ़ोन करके पेरेंट्स को तरह तरह की धमकिया दी जाती हैं.

और एक बार आपने फीस भर दिया तो आपका बच्चा पढ़े या नहीं पढ़े इस बात से स्कूल वालो को कोई फर्क नहीं पढता हैं. उन्हें उनकी फीस टाइम पर मिलते रहनी चाहिए. ये वो ज़माना नहीं हैं जब आप पढ़ाई में कमजोर हो तो आपके पेरेंट्स को स्कूल बुलाया जाता था. टीचर और पेरेंट्स के बीच उस वक्त एक अच्छा बर्ताव हुआ करता था. लेकिन आज पेरेंट्स के साथ स्कूल में भी बुरे तरीके से बात किया जाता हैं.

उसकी वजह भी ऐसी हैं की आजकल स्कूल में वो टीचर्स नहीं रह गए हैं. नए नए लोगो को भर्ती होती हैं जिन्हे कम सैलरी दी जाती हैं. टीचर्स भी ज़्यदातर नए खून वाले होते है जिन्हे बात करने का तरीका तक नहीं होता. लेकिन इस तरह की बात को इस वक्त करने का क्या मतलब हैं? मतलब हैं. मतलब ये हैं की जब तक स्कूल नहीं खुलेगा तब तक स्कूल का बिजनेस नहीं बढ़ेगा. अब इसके लिए इन स्कूल वालो ने क्या किया हैं इन लोगो ने ऑनलाइन पढ़ाना शुरू कर दिया हैं. ऑनलाइन पढ़ाई हो कैसी रही हैं. मोबाइल के ऊपर. वही मोबाइल जो एक समय अगर बच्चा स्कूल लेकर चला जाये तो बवाल खड़ा हो जाता था.

अब सोचिये उस छोटे से मोबाइल पर आपके घर का बच्चा क्या पढ़ाई करता होगा. इन स्कूल वालो को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता हैं. भले ही आपके बच्चे की आँख खराब हो या मोबाइल गर्म होकर फट ही क्यों ना जाएं. लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई हो रही हैं मतलब स्कूल वालो को आमदनी का रास्ता खुला हुआ हैं.

पिछले ७ महीने से कई लोगो की नौकरी छूट गयी हैं. जिनके पास हैं उनकी सैलरी ४०-५० % तक कटौती के साथ आ रही हैं. अब इन पैसो में वो घर चलाएगा या EMI भरेगा. सरकार ने कह दिया था की EMI नहीं कटेगी. लेकिन ऐसा हुआ क्या ? जिसके बैंक में पैसे पड़े हैं. बैंक वालो ने या तो काट लिए या फ़ोन कर करके परेशान कर दिया.

चलिए ये बात मानता हूँ की एजुकेशन बहुत ज़रूरी हैं. लेकिन छोटे छोटे बच्चों को घंटो मोबाइल पर बैठकर इस तरह से पढ़ाना कितना सही हैं ? पढ़ाना ही हैं तो जो बच्चे दसवीं क्लास में है उन्हें पढ़ाओं उनकी बोर्ड एक्साम्स होगी. बाकी छोटे बच्चों को तो ऐसे ही पास कर दो. हमने भी पढ़ा था की बाबर कब पैदा हुआ. कब भारत आया. कब उसने लूटपाट मचाई. कब मरा. इससे हमें क्या फर्क पढ़ा था पढ़कर. तो आज के बच्ची अगर एक साल तक बाबर -अकबर से दूर रहेंगे तो कुछ बिगड़ नहीं जानेवाला हैं.

मैथ्स की कॉश, साइन थीटा पढ़कर हम कौन सा उसका इस्तेमाल कर रहे हैं. हर पेरेंट्स के पास इतना पैसा नहीं हैं की वो मोबाइल खरीद सकें और उनका क्या जिनके घर में तीन या चार बच्चे हैं. देखिये मेरा तो यही मानना हैं की सिर्फ उन्हें पढ़ाओ जिनके बोर्ड एक्साम्स हैं बाकी बच्चों को इस तरह से पढ़ाना सही नहीं हैं.

अब ये तो आम जनता की हालत हैं. बड़े बड़े लोगो का क्या हाल हैं वो सुनो. झारखंड के शिक्षा मंत्री हैं जगरनाथ महतो. इनकी नातिन दिल्ली पब्लिक स्कूल में कक्षा चार में पढ़ती हैं. ६ महीने से फीस नहीं भरी गयी थीं तो उसका नाम काट दिया गया.जब शिक्षामंत्री स्कूल पहुंचकर उन्होंने फीस भरा तब जाकर ऑनलाइन क्लास में उसकी पढ़ाई हुयी. बाद में स्कूल वालो ने ये कह दिया की कुछ प्रॉब्लम थीं जिसके चलते ऑनलाइन क्लॉस में आपकी बची कनेक्ट नहीं हो पा रही थीं. लेकिन जैसे ही शिक्षा मंत्री ने फीस भर दिया वैसे ही मोबाइल का इंटरनेट और स्कूल दोनों ही कनेक्ट हो गए.

हम आज कहाँ जा रहे हैं. किस समाज में जी रहे हैं. क्या शिक्षा प्राप्त करना ज़िंदगी जीने से ज़्यदा बड़ा हैं क्या ? सरकार भी कहा कहा क्या करें. हर कोई अपनी मर्जी का मालिक हैं. इस सवाल के कई जवाब होंगे और मैं चाहूंगा की आप कमेंट करके अपनी राय ज़रूर रखें.

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