मदर इंडिया से लेकर पीपली लाइव तक, किसानों के आत्महत्या और कर्ज में ढूबने की स्थिति दर्शाती हैं ये बॉलीवुड फिल्में


इस वक्त किसान आंदोलन चल रहा हैं. लेकिन किसान आंदोलन के नाम पर कुछ लोग अपनी राजनीती का रास्ता भी साफ़ कर रहे हैं. आज़ादी के बाद से लेकर अब तक हर साल कई किसान आत्महत्या करते चले आएं हैं.लेकिन तब की सरकारों ने किसान हितों के लिए कुछ नहीं किया. फायदा सिर्फ नेताओं का दलालों का होता था.

किसानों की ज़िंदगी पर कई फिल्मे बनी जिसने किसानों के दर्द को दिखाने का काम किया हैं. मौजूदा किसान बिल जो मोदी सरकार ने बनाया हैं वो किसानों के लिए कितना फायदेमंद होगा वो आनेवाले समय में पता चलेगा. चलिए जानते हैं की आपने इसमें से कौन सी फिल्म देखी हैं और इनसे क्या सीखा हैं. आपकी राय कमेंट ज़रूर कीजियेगा.

मदर इंडिया- महबूब खान के निर्देशन में बनी मदर इंडिया फिल्म साल 1957 में रिलीज हुई थी। फिल्म में नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राज कुमार ने लीड रोल निभाया था। ये फिल्म साल 1940 में आई फिल्म औरत का रीमेक थी। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह पति की नामौजूदगी में मां बंजर जमीन में खेती कर अपने दो बच्चों की परवरिश करती है। इस दौरान नरगिस को खेती करने के लिए साहूकारों को ब्याज पर पैसे लेने पड़ते हैं जिन्हें चुकाने में उसका सबकुछ चला जाता है।

दो बीघा जमीन- साल 1953 में रिलीज हुई फिल्म दो बीघा जमीन को बिमल रॉय ने डायरेक्ट किया था। इस फिल्म में बलराज साहनी और निरूपा रॉय लीड किरदारों में थे। फिल्म में दिखाया गया था कि किस तरह एक किसान अपना कर्ज चुकाने के लिए रिक्शाचालक बन जाता है और परिस्थितियों से लड़ते हुए अपनी जमीन बचा लेता है। ये पहली फिल्म थी जिसे फिल्म फेयर बेस्ट मूवी का अवॉर्ड मिला था।

उपकार – साल 1967 में रिलीज़ हुई फिल्म उपकार मनोज कुमार के निर्देशन में बनी थीं. जिसे पूर्व प्रधानमंत्री के स्लोगन जय जवान जय किसान की तर्ज़ पर बनाया गया था. फिल्म की कहानी एक ग्रामीण महिला राधा (कामिनी कौशल) और उसके दो पुत्रों भारत (मनोज कुमार) व पूरन (प्रेम चोपड़ा) पर आधारित हैं. गरीबी के चलते राधा दोनों को पढ़ा नहीं पाती. भारत यानी मनोज कुमार किसान बन जाते हैं और पूरन यानी प्रेम चोपड़ा को पढ़ने के शहर भेज देते हैं. पूरन जब पढ़कर गाँव आता हैं तब जायदाद में हिस्सा मांगता हैं. भारत अपना सब कुछ पूरन को देकर फ़ौज में लड़ाई के चला जाता हैं. जहां युद्ध के दौरान वह घायल हो जाता हैं लेकिन किसी तरह वापस अपने गाँव पहुँचता हैं. इसके बाद पूरन को उसके गलत धंदे के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता हैं. लेकिन सरकारी गवाह बनकर वो कला ओरख धंदा करने वालो को पकड़वा देता हैं.

किसान- साल 2009 में रिलीज हुई मल्टीस्टारर फिल्म में जैकी श्रॉफ, सोहेल खान, दिया मिर्जा और अरबाज खान ने लीड रोल निभाया था। फिल्म का निर्देशन पुनीत सिरा ने किया था। इस फिल्म को किसानों की आत्महत्या के विषय पर बनाया गया है। जहां एक भाई शहर जाकर सुविधा में रहता है तो वहीं दूसरा छोटा भाई पिता जैकी श्रॉफ के साथ जमीन बचाने और खेती करने के लिए गांव में ही रहता है।

पीपली लाइव- 83वें अकेडमी अवॉर्ड की बेस्ट फॉरेन फिल्म केटेगरी में जगह बनाने वाली फिल्म पीपली लाइव ने दर्शकों की खूब सराहना लूटी थी। फिल्म में ओमकार दास मानिकपुरी, नसीरुद्दीन शाह, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रघुबीर यादव, शालिनी वत्स और मलाइका शिनॉय ने अहम भूमिकाएं निभाई थीं। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह किसान के हालात को मीडिया टीआरपी और नेता अपने पॉलिटिकल फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। कहानी नत्था नाम के एक गरीब किसान पर बेस्ड है जो जमीन खो देने के बाद परिवार को पालने में असफल हो जाता है और आत्महत्या करने की ठान लेता है। ये फिल्म अनुषा रिजवी की डायरेक्टोरियल डेब्यू थी।

लगान- साल 2001 में रिलीज हुई फिल्म लगान अकेडमी अवॉर्ड की बेस्ट फॉरेन फिल्म केटेगरी में पहुंचने वाली तीसरी बॉलीवुड फिल्म थी। आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आमिर खान, ग्रेसी सिंह, रेचल शैली और पॉल ब्लैकथोर्न अहम किरदारों में थे। फिल्म को किसानों की जमीन के टैक्स के मुद्दे पर बनाया गया है। अंग्रेजों द्वारा किसानों की जमीन का दोगुना लगाना वसूला जाने लगता है जिसके विरोध में आमिर खान गरीब किसानों की आवाज बनते हैं। लगान माफ करवाने के लिए आमिर अंग्रेजों का चैलेंज स्वीकार कर उनसे क्रिकेट का मुकाबला करते हैं।

Source : Bhaskar.com

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