हिंदू धर्म दुनिया का सबसे Polite & Tolerant धर्म हैं | अपने बयान से कैसे पलट गए जावेद अख्तर


कुछ दिन पहले जावेद अख्तर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की तुलना तालिबान से की थी. जिसे लेकर काफी बवाल हुआ था. बवाल तो होना ही था. जिस आरएसएस की तुलना जावेद अख्तर तालिबान से कर रहे थे वही आरएसएस हर मुश्किल वक्त में देश के साथ खड़ा रहता हैं.

फिर चाहे भूकंप हो, बाढ़ हो, कोरोना हो या फिर कोई और आपदा. लेकिन विपक्ष और बॉलीवुड से कुछ ऐसे लोग हैं जो राजनीती के लिए हमेशा ही आरएसएस को अपना निशाना बनते रहे हैं. लेकन अब जावेद अपने बयान से पलट गए हैं.

अब शिवसेना के मुझ्पात्र सामना में जावेद अख्तर ने लिखा है कि भारत कभी अफगानिस्तान जैसा नहीं बन सकता, क्योंकि भारतीय स्वभाव से चरमपंथी नहीं हैं। सामान्य रहना उनके डीएनए में है। दुनिया में हिंदू सबसे ज्यादा सभ्य और सहिष्णु समुदाय हैं।

जावेद अख्तर ने हैरानी जताई कि उनके बारे में यह कहा गया है कि वे सिर्फ हिंदू कट्टरवाद पर अपना मुंह खोलते हैं और इस्लामिक कट्टरता पर चुप रह जाते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसा कहने वाले उनके पिछले कामों से अनजान हैं.

जावेद अख्तर ने लिखा है, ” पिछले दो दशकों में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा मेरी जान को खतरा होने की वजह से मुझे दो बार पुलिस सुरक्षा दी गई. पहली बार तब जब मैंने तिहरे तिलाक का विरोध किया था. वह भी तब जब देश में इसकी ज्यादा चर्चा भी नहीं थी… 2010 में एक टीवी डिबेट में मैंने पर्दा के रिवाज़ के ख़िलाफ़ मौलाना कल्बे जवाद से ज़ोरदार बहस की थी. मौलाना इस वजह से मुझसे काफ़ी नाराज़ भी हुए. लखनऊ में मेरे पुतले जलाए गए. मुझे एक बार फिर धमकियों भरे मेल आने लगे. मुझे फिर एक बार पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई गई. इसलिए यह इल्ज़ाम बेबुनियाद है कि मैं मुस्लिम कट्टरतावाद के ख़िलाफ़ नहीं बोलता.”

आगे जावेद अख्तर कहते हैं, “मैंने एक इंटरव्यू में कहा था कि हिंदू दुनिया में सबसे सभ्य और सहिष्णु बहुसंख्यक हैं. यह मैंने कई बार कहा है. मैंने पूरी मज़बूती से यह भी कहा है कि हिंदुस्तान कभी भी अफगानिस्तान नहीं हो सकता. इसकी वजह यह है कि हिंदुस्तानी स्वाभाविक रूप से ही कट्टर नहीं हैं. मध्यममार्ग उनके डीएनए में है. अब आपके मन में यह सवाल होगा कि इतने साफ़ तरीके से मैं अपनी बात बोलता हूं, फिर भी लोग मुझसे इतने नाराज़ क्यों हैं? इसका जवाब यह है कि मैंने हर धर्म के कट्टरपंथियों के विरोध में कहा है और उनकी बातों को नकारा है. हर समुदाय के कट्टरपंथियों के विचारों में अद्भुत समानताएं हैं. ”

आखिर में जावेद अख्तर लिखते हैं, ” हां उस इंटरव्यू में मैंने संघ परिवार के कुछ संगठनों के संबंध में अपना आक्षेप व्यक्त किया था. धर्म, जाति और पंथ के आधार पर लोगों के बीच फूट डालने वाली ऐसी किसी भी संस्था के विरोध में जो भी लोग खड़े हैं, उन सबके पीछे मैं खड़ा हूं. शायद यही वजह है कि 2018 में हिंदुस्तान के सबसे आदरणीय मंदिरों में से एक वाराणसी के संकटमोचन मंदिर के आयोजकों ने मुझे आमंत्रित किया और वहां मुझे ‘शांतिदूत’ की उपाधि दी गई. मंदिर के अंदर भाषण करने का मुझे अवसर दिया गया. मुझ जैसे नास्तिक के लिए यह बड़े सम्मान की बात है.”

जावेद अख्तर का बदला हुआ ये रूप दिखाता है की जावेद खुद को अब बचने की कोशिश कर रहे हैं की कहीं वो लपेटे में आ गए तो उनके घर पर भी रेड वगैरह ना पड़ जाएं या फिर किसी और मामले में उन्हें घसीट ना लिया जाएँ. इसलिए जावेद अख्तर कुछ डरे डरे नज़र आ रहे हैं.


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