हमारी सरकारें इतनी लापरवाह क्यों ? कोरोना में स्कूल खोलने का क्या मतलब ?


इंसान की ज़िंदगी में जब तक प्रॉब्लम होती हैं वो तभी तक उस प्रॉब्लम के बारे में बात करता हैं. लेकिन जैसे ही वो प्रॉब्लम थोड़ी दूर जाती हैं हम उसे भूल जाते हैं. यही चीज़ हमारे लिए आगे चलकर बहुत बड़ी प्रॉब्लम बन जाती हैं.,

कोरोना की पहली और दूसरी लहार ने लाखो लोगो की जान ले ली. साथ में बेरोजगारी और बहुत सी प्रॉब्लम साथ लेकर आयी. अगर इन सब में सबसे ज़्यादा कोई सेफ रहा हैं तो वो है स्कूल वाले. जिनकी ना फीस रुकी ना ऑनलाइन पढ़ाई. स्कूल पेरेंट्स पर इतना दबाव बना रहे हैं लेकिन हमारी सर्कार चाहे वो केंद्र की हो या राज्य की साथ दे रही हैं तो सिर्फ स्कूल वालो का.

फीस में कोई कटौती नहीं की गयी. स्कूल पेरेंट्स पर इतना दबाव बना रहे मानो उन लोगो ने बहुत बड़ा क्राइम कर दिया हैं. जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं ये स्लोग्न हर किसी को याद हैं. लेकिन स्कूल वालो ने भी अपना स्लोगन बना लिया हैं. जब तक फीस नहीं तब तक पढ़ाई नाही.

जिन बच्चो की फीस नहीं भरी जाती उन्हें आगे की क्लास में प्रमोट नहीं किया जा रहा हैं. या फिर ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान ग्रुप से निकाल दिया जाता हैं ब्लॉक कर दिया जाता हैं. जो पेरेंट्स महीने भर की फीस नहीं भर पाती हैं. उन पेरेंट्स से स्कूल वाले ये कहते हैं की आपको एडवांस में पूरा साल की स्कूल फीस भरनी होगी.

अब नया ड्रामा महाराष्ट्र में चार अक्टूबर से स्कूल खोले जा रहे हैं जो बच्चो के लिए बहुत अब्दा डेंजर हैं क्यों की अभी तक बच्चो की वैक्सीन नहीं आयी हैं. और हमारे देश में जिन लोगो ने कोरोना की पहल डोज ली उनमे से छह करोड़ लोग दूसरी डोज लेने तक नहीं गए. ऐसा नहीं है की वैक्सीन ख़त्म हो गयी हैं. बहुत हैं लेकिन ये लापरवाही हैं उन लोगो की.

अमेरिका में स्कूल खुलने के दो महीने के भीतर अब तक ढाई लाख बच्चो को कोरोना हुआ और उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट किया गया. कहने का मतलब ये हैं की जब ऑनलाइन पढ़कर आपने दो साल निकल दिया हैं तो स्कूल खोलने की अभी क्या ज़रूरत हैं. इस साल और रूक जाओ. अगले साल तक अगर सब सही रहा. कोरोना की तीसरी लहार नहीं आती हैं तो समझो सब ठीक हैं.

लेकिन वही गलती दोबारा हो रही हैं जो पिछले साल की जिसके चलते कोरोना की तीसरी लहार आयी जिसमे सबसे अधिक मौतें हो गयी. इस वक्त मेरा मानना हैं की स्कूल ना खोले तो अच्छा हैं. वरना इसका खीमियाज़ा सिर्फ आम जनता को भुगतना पड़ेगा. पॉलिटीकन को नहीं जो बिना सोचे स्कूल खोलने की तैयारी कर चुके हैं.


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