मुस्लिम देश किर्गिस्तान क्यों जल रहा हैं ? जाने पूरी बात


अगर आपको लगता हैं की आज़ादी के नारे सिर्फ भारत में ही लगते है. यहाँ पर भी आगजनी होती हैं. तो आपको एक और देश के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसका नाम हैं किर्गिस्तान. सेंट्रल एशिया का ये एक मुस्लिम देश हैं जहां पर क्रिस्टियन, JEWS और बौद्ध धर्म को मानाने वाले लोग रहते हैं इसमें 90 % प्रतिशत जो लोग हैं वो मुस्लिम्स हैं. यहाँ पर एक और धर्म को माननेवाले लोग रहते हैं जिसका नाम हैं बहाई जो सभी धर्मो की अच्छी बात को सिखाता हैं और आपस में किस तरह से एकता बनाकर रखनी हैं उसकी भी बात बतलाता हैं. किर्गिस्तान की राजधानी है बिस्केक और ये वहा का सबसे बड़ा शहर भी हैं.

जिन लोगो को नहीं पता उन्हें बता दूँ की किर्गिस्तान पहले सोवियत संघ का हिस्सा था जो कोल्ड वॉर के बाद साल 1991 में अलग हो गया और एक नया देश बना. यहां पर जो सबसे ज़्यदा बोलनेवाली भाषा हैं वो है रुस्सियन. किर्गिस्तान चार देशो से घिरा हैं यानी इसके नार्थ में कज़ाकिस्तान, वेस्ट और साउथ वेस्ट में उज़्बेकिस्तान, साउथ वेस्ट में ताजिकस्तान और ईस्ट में चायना हैं.

किर्गिस्तान का इतिहास 2000 साल पुराना हैं जिसमे कई विदेशी ताकतों ने हमले कर के अपने अधिकार में लिया था लेकिन किर्गिस्तान 1876 में ये सोवियत संघ का हिस्सा बना. जब साल 1991 के बाद ये सोवियत संघ से अलग हुआ उसके बाद से लेकर अब तक यहाँ पर पार्लियामेंट के इलेक्शन होते हैं और फिर सरकार चुनी जाती हैं ठीक वैसे ही जैसे भारत में होता हैं.

किर्गिस्तान मेंबर हैं कामनवेल्थ ऑफ़ इंडिपेंडेंट स्टेट्स,eurosian इकनोमिक यूनियन,कलेक्टिव ट्रीटी सिक्योरिटी आर्गेनाइजेशन,शंघाई कोपरशन आर्गेनाइजेशन, आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लमिक को ऑप्रेशन, TURKIC COUNCIL , TURKSOY और यूनाइटेड NATIONS .

किर्गिस्तान में तेल और गैस का भंडार भी हैं लेकिन इतना नहीं की वो पूरा हो सकें इसलिए ये दूसरे देशों से इम्पोर्ट करते हैं इन चीज़ों को फिर इनके यहाँ एक उभरता हुआ सेक्टर हैं गोल्ड माइनिंग का जिनके ऊपर इस देश की इकॉनमी टिकी हुयी हैं.

अब आते हैं उस मुद्दे पर जिस लेकर किर्गिस्तान में पिछले एक हफ्ते से प्रोटेस्ट चल रहा हैं. प्रोटेस्ट चलने का सबसे बड़ा रीज़न ये हैं की वहा के लोग इल्जाम लगा रहे हैं की इलेक्शन में घपला किया गया हैं जिसके चलते ये जिसे चाह रहे थे वो नहीं जीता हैं. बेलारूस की तरह यहाँ भी फिर से इलेक्शन करवाने की मांग की जा रही हैं.

इन प्रोटेस्ट करनेवालों का प्रदर्शन इतना बढ़ गया हैं की इन लोग ने वहा के पूर्व राष्ट्रपति अलमाजबेक को ही छुड़ा लिया हैं. इन लोगो ने वाइट हाउस को बिल्डिंग को भी नुक्सान पहुंचाया हैं जहां पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बैठते हैं. यहाँ जो प्रदर्शन चल रहा हैं वो अब घातक रूप ले चुका हैं इसलिए पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले, पानी की बौछारें और तेज आवाज करने वाले ग्रेनेड भी छोड़े हैं.

अब तक इस प्रदर्शन में ६०० से ज़्यदा लोग घायल हो चुके हैं और एक आदमी की मौत भी हो चुकी हैं. फिलहाल किर्गिस्तान में अस्थिरता बनी हुयी हैं और ये ऐसा पहला मामला नहीं हैं. यहाँ की जो राष्ट्रपति हैं जीनबेकोव उन्होंने कहा की अगर एलक्शन में कुछ गड़बड़ हुआ हैं तो हम विपक्ष से बात करके फिर से इलेक्शन करवाएंगे.

देखिये प्रोलेम क्या हैं अभी किर्गिस्तान में की यहाँ अभी तक प्रधानमंत्री नहीं चुने गए हैं. और यहाँ पर भीड़तंत्र का कब्ज़ा बढ़ते जा रहा हैं. भीड़तंत्र का कब्ज़ा बढ़ना मतलब वो जिसे चाहेंगे उसे वहा का प्रधानमंत्री बना देंगे. यानी कल को अगर कोई और भीड़तंत्रा एक अलग ग्रुप और एक अलग ताकत के साथ आगे बढ़ती हैं तो वो अपने हिसाब से अपना प्रधानमंत्री गद्दी पर बैठा देगी.

अब किर्गिस्तान में हुआ क्या हैं की भीड़ ने अपने हिसाब से जो पॉलिटिशियन जेल में बंद थे उन्हें छुड़ा लिया हैं. फिर ३५ एमपी मिलकर उन्होंने अपना एक नया प्रधानमंत्री बना लिया हैं जिनका नाम हैं जाप्रोव.

फिर उसके दूसरे दिन क्या की एक दूसरी भीड़ ने किसी और को अपना प्रधानमंत्री बना लिया जिनका नाम हैं तिलेक टकटोगाजिव. उन लोगो का कहना हैं की ये बेटर प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

किर्गिस्तान में अस्थिरता का मामले पहली बार नहीं हैं. इससे पहले साल 2005 में तुलिप रेवोलुशन फिर 2010 में अप्रैल रेवोलुशन और अब ये घटना अक्टूबर महीने में हो रही हैं तो इसे अक्टूबर रेवोलुशन का नाम दे दिया हैं.

तो मिला जलाकर किर्गिस्तान में हो चल रहा हैं वो सही नहीं हैं. और आगे सही होगा इस तरह की उम्मीद फिलहाल तो नज़र नहीं आ रही हैं.

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