कागज़ फिल्म रिव्यु : दुनियाँ खत्म हो जाएगी, लेकिन हमारा सिस्टम कभी खत्म नहीं होगा.


फिल्में बहुत आती सी आती हैं चली जाती हैं लेकिन जिस फिल्म में पंकज त्रिपाठी हो वो फिल्म मिटटी नहीं सोना बन जाती हैं. सच कहें तो पंकज त्रिपाठी एक्टिंग नहीं करते बल्कि हर उस किरदार को इस तरह से आपके सामने पेश करते हैं की मानो वो आप ही कहानी कह रहे हों. मैंने पहले ही कहा था की बॉलीवुड की हर फिल्म का बहिस्कार नहीं किया जा रहा हैं.

एक तरफ सड़क २ और कुली नंबर वन को IMDB पर सिंगल रेटिंग मिली हैं तो दूसरी तरफ पंकज त्रिपाठी की फिल्म कागज़ को 8.1 की रेटिंग मिली हैं और ये इस बात की गवाह हैं की इंडियन ऑडियंस बेवक़ूफ़ नहीं बहुत समझदार हैं.

तो फिल्म की कहानी कहानी अस्सी के दशक की हैं. पंकज त्रिपाठी की ज़िंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा होता हैं लेकिन एक दिन उनकी पत्नी बोलती हैं की लोन वगैरह लेकर अपना बैंड बाजे का बिजनेस थोड़ा और बड़ा कर लो. अब पंकज त्रिपाठी यानी भरतलाल लोन लेने के लिए बैंक जाते हैं बैंक वाले बोलते हैं की गिरवी रखने के लिए क्या हैं तो बोलते है ज़मीन हैं. जब ज़मीन का कागज़ लेने जाते हैं तब पता चलता हैं की उनके रिश्तेदारों ने उन्हें लेखपाल को पैसे खिलाकर उनकी ज़मीन अपने नाम करवा ली हैं.

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बस यही से कहानी शुरू होती हैं हमारे सिस्टम की. भरतलाल को ये यकीन दिलाता हैं की तुम ज़िंदा तो हो लेकिन ज़िंदा नहीं हो. मतलब तुम रियल लाइफ में ज़िंदा हो लेकिन कागज़ पर मर चुके हो. अब कागज़ पर खुद को ज़िंदा साबित करने के लिए भरतलाल हर वो हथकंडा अपनाता हैं जो उसे ठीक लगा.

वो राजीव गाँधी के सामने चुनाव लड़ते हैं. खचाखच भरे कोर्ट रूम में जज को गालीया तक दे डालते हैं लेकिन जज कोई केस दर्ज नहीं करता. अपने उन्हें भाई के लड़के को किडनेप करता हैं ताकि पुलिस उनके ऊपर एक केस दर्ज कर सके और पता चल सकें की भरतलाल तो ज़िंदा हैं.

संसद का विजिटर पास लेके भरी संसद में पर्चे फेंकना शुरू करता हैं की मैं ज़िंदा हूँ मुझे इन्साफ चाहिए. मुझे कागज़ पर ज़िंदा करों. भरतलाल के जैसा हाल कई और लोगो का था तो आल इंडिया मृतक संघ खोल देते हैं. फिल्म के अंत में खुद की शवयात्रा निकलवाते हैं. मतलब अब भरतलाल के लिए कागज़ पर ज़िंदा रहना उतना ही ज़रूरी बन गया जितना जीवित रहने के लिए सांस का लेना.मछली के लिए पानी का. गाडी के लिए पेट्रोल का.

फिल्म असल कहानी पर आधारित हैं. आज़मगढ़ के अमिलो में रहनेवाले लालबिहारी मृतक की इस पूरी कहानी को थोड़ा क्रिएटिव अंदाज़ में दिखाने की कोशिश की गयी हैं. लालबिहारी मृतक को साल 2003 में IG NOBEL PRIZE से सम्मानित भी किया गया था. ये वो प्राइज होता हैं जिन लोगो का शुरू में मज़ाक उड़ाया जाता हैं लेकिन अंत में वो लोग कुछ बड़ा कर जाते हैं.

पंकज त्रिपाठी और इस फिल्म कागज़ से आपकी नज़र एक सेकंड के लिए भी नहीं हटनेवाली हैं. फिल्म का म्यूजिक और फिल्मांकन आपको पुराने दौर की फिल्मों की याद दिलाता हैं. भोजपुरी में बना गाना इस फिल्म के साथ जब बैकग्राउंड में चलता हैं तो आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाता हैं.

इस फिल्म को आप कई बार देख सकते हैं. क्यूंकि पंकज त्रिपाठी ने साबित कर दिया हैं की स्टोरी कोई भी लेकर आओ सुपरहिट हम बना ही देंगे.

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