अमेरिकी सेना के जाते ही तालिबान ने अफगानिस्तान को नरक बना दिया


अफगानिस्तान का नाम सुनते ही मेरे दिमाग में कुछ तसवीरें नज़र आती हैं. आज़ादी, आतंकवाद से मुक्ति, क्रिकेट. लेकिन इन तस्वीरों में अब आग लग चुकी हैं. क्यूंकि अमेरिका और बाकी देशों के लाखों सैनिक अफगानिस्तान से जा चुके हैं. अब वहा तालिबान का राज हो गया हैं. वही तालिबान जिसने अफगानिस्तान को इस्लाम के नाम पर नरक बना दिया हैं.

अब वहा औरतें अकेले नहीं घूम सकती हैं. नौकरी नहीं कर सकती. उन्हें बुर्के में रहना होगा. पुरुष डॉक्टर से इलाज नहीं करा सकती. अपने पति के साथ ही बाहर निकल सकती हैं. अगर किसी पराये मर्द की तरफ देखा तो ना जाने कितने चाबुक खाने होंगे.

मर्दो के लिए दाढ़ी रखना अनिवार्य हो गया हैं. यानी जिन अफगानिस्तान के क्रिकेटर्स को आप बिना दाढ़ी मूछों के देखते हो उन्हें अब ये नियम का पालन करना होगा. हो सकता हैं की क्रिकेट पर हमेशा के लिए पाबन्दी भी लग जाएं. जो नमाज नहीं पढ़ेगा उसका सर काट दिया जायेगा.

वहा की सरकार अब किसी काम की नहीं रही. अब तक अफगानिस्तान के तीन चौथाई हिस्से पर तालिबान का कब्ज़ा हो चूका हैं. यानी अफगानिस्तान के लोगो की ज़िंदगी फिर से तबाह होने वाली हैं. अमेरिकी सैनिकों के वहा से निकलने के बाद अफगानिस्तान के आर्मी वाले अफगानिस्तान छोड़ दूसरे देश भाग चुके हैं.

लेकिन ऐसा क्या हुआ की अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ दिया और अफगानिस्तान की सरकार को बस आश्वासन दिया बाकी डील तालिबान से की हैं.

अफगानिस्तान एक समय ऐसा देश था जहां बुरका दूर की बात थीं वहा की औरतें छोटे कपडे पहनकर घूमती थीं. जहा जाना हैं वहा जाती थीं.

लेकिन इसी दौरान शीत युद्ध की छाया अफगानिस्तान पर पड़ी. 1978 में सोवियत संघ की देखरेख में अफगानिस्तान में क्रांति हुई. अमेरिका ने कम्युनिस्ट सोवियत संघ के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए एक गुप्त ऑपरेशन को मंजूरी दी. इसके तहत अफगानिस्तान में कट्टर इस्लामिक विचारधारा वाले लड़ाकों (मुजाहिद्दीनों) को तैयार किया गया. जिन्होंने लगातार कमजोर हो रहे सोवियत संघ को हरा दिया.

90 के दशक में अफगानिस्तान में एक अंतरिम सरकार बनी. इस बीच मुजाहिद्दीनों के अलग-अलग ग्रुप सत्ता पाने के लिए लड़ने लगे. फिर अफगानिस्तान के मदरसों में पढ़े छात्रों ने एक ग्रुप बनाया. नाम दिया-तालिबान. यह ग्रुप 1994 में बना. 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया, जो प्रभावी रूप से 2001 तक रहा.

लेकिन जो चाल अमेरिका ने चली थीं वही उस पर उल्टी पडी. अमेरिका पर सबसे बड़ा आतंकी हमला होता हैं जिसमे हज़ारो लोग मारे जाते हैं. नाम आता हैं ओसामा बिन लादेन. जिसे तालिबान ने सरंक्षण दे रखा था. अमेरिका तालिबान से कहता हैं की ओसामा बिन लादेन हमें सौंप दो. तालिबान मना कर देता हैं. जिसके बाद अमेरिका अफगानिस्तान पर हमला करता हैं और तलिबान से मुक्त कर देता हैं.

ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने छुपा रखा था जिसे अमेरिकी सेना ने घर में घुसकर मार दिया था. तालिबान का फाउंडर मुल्ला मुहम्मद उमर भी अमेरिकी हमले में मारा गया. जिससे ये लगने लगा की अब अफगानिस्तान पर तालिबान का कुछ नहीं रहेगा सब खत्म हो गया.

इस बीच साल 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में ट्रंप ने चुनावी वादा किया कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेंगे और अमेरिका दूसरों की लड़ाई नहीं लड़ेगा.

अपने वादे को पूरा करने के लिए ट्रंप ने साल 2020 में तालिबान के साथ एक शांति समझौता किया. 29 फरवरी, 2020 को हुआ यह समझौता दोहा संधि के नाम से जाना गया. संधि के तहत यह तय हुआ कि अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों को वापस बुलाया जाएगा.

इस संधी में ये डील हुयी की तालिबान अमेरिका के नियंत्रण वाले इलाकों में ऐसी गतिविधियों को संरक्षण नहीं दिया जाएगा जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा पर कोई खतरा आए. संधि में यह भी तय हुआ है कि तालिबान और अफगानिस्तान मिलकर शांति कायम करने का मसौदा तैयार करेंगे. इस संधि में कहीं भी महिलाओं के अधिकारों की बात नहीं थी.

हालाँकि तालिबान का डिप्टी लीडर सिराजुद्दीन हक्कानी ने कहा था की अमेरीके सैनिको के जाने के बाद वो महिलओं को सभी इस्लामिक अधिकार देगा. रोजगार देगा. शिक्षा देगा. स्वतंत्रता देगा.

साल 2020 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुए. ट्रंप हार गए. जो डील ट्रम्प ने की थीं उसे इस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने किनारे कर दिया और कहा की सभी अमेरिकी सैनिक वापस लौट आएंगे.

इस बीच अफगानिस्तान में कामकाजी औरतों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले बढ़ते गए. कइयों का जान चली गई. साल 2020 में इस तरह की कुल 136 हत्याएं हुईं. इन हत्याओं की जिम्मेदारी बार-बार तालिबान पर डाली गई. लेकिन तालिबान ने अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

एक्सपर्ट का ये कहना हैं की “पश्चिमी देशों ने अपने हितों की रक्षा के लिए तालिबान को खड़ा किया. बाद में तालिबान ने इस्लाम की अपनी एक कट्टर परिभाषा समाज पर थोप दी. एक समय में अफगानिस्तान की महिलाएं किसी पश्चिमी देश की महिलाओं सरीखी ही आजाद थीं. तालिबान ने वो सब छीन लिया. अपने इस्लाम और अपने कुरान के नाम पर”

यानी अमेरिका अपने सैनिकों की जान और खतरे में नहीं डालेगा. उनका खर्चा अफगानिस्तान में अमेरीकी सरकार पर काफी दबाव डाल रहा था. कोरोना के चलते अमेरिका की अर्थव्यवस्था टूट गयी हैं. उसका कहना हैं की वो अफगानिस्तान की लड़ाई नहीं लड़ेगा. उसका फैसला अफगान जनता लें.

यानी कुछ साल बाद जब अफगानिस्तानमें फिर से तालिबान का आतंक मचेगा. अफगानिस्तान पर पाकिस्तान का भी काफी असर रहा हैं. अब वो अफगानिस्तान को आतंक के लिए इस्तेमाल करेगा. तालिबान और पाकिस्तान एक बार फिर से मिलकर भारत पर कुछ ना कुछ हमला करने की प्लानिंग करते रहेंगे.

अब अमेरिका अपना पुराना व्यापार करेगा जो हथियार बेचने का हैं. जब शांति रहेगी तो हथियार नहीं बिकेगा. और जब हथियार नहीं बिकेगा तब अर्थव्यवस्था कैसे बढ़ेगी. वो पाकिस्तान और तालिबान दोनों को हथियार बेचेगा. ताकि भारत को कमजोर किया जा सकें. क्यूंकि भारत तेजी से उभर रहा हैं जो अमेरिका को पसंद नहीं हैं.

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